Luxury Trap: Rolex, iPhone, GUCCHI, ARMANI सब है ट्रैप

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Luxury Trap: Rolex, iPhone, GUCCHI, ARMANI सब है ट्रैप

बेंगलोर में, 22 साल का लड़के ने, EMI ना भर पाने के कारण आत्महत्या कर ली।

इस ही तरह एक कपल ने भी EMI ना भर पाने की वजह से आत्महत्या की।

चीन का वो मशहूर लड़का शांग गुन, जिसने iPhone लेने के लिए किडनी बेच दी थी, और 2 साल पहले की लास्ट खबर यह है कि यह बैड से उठ तक नहीं पाता है।

ऐसे ही कई हजारों केस है, जहाँ पर लोग लग्जरी ट्रैप में फंस कर, एक लग्जरी गुड जैसे iPhone वगैरह EMI पर लोगों के देखा देखी ले लेते हैं, उसके बाद EMI नहीं भर पाते हैं। जिसकी वजह से, फिर यह डिप्रेशन का शिकार बन जाते हैं, और कई परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं।

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वेब्लेन इफेक्ट

Veblen Effect का मतलब, एक ऐसा प्रोडक्ट खरीदना जो की वैल्यू फॉर मनी नहीं है। यानी जितने पैसे उस खरीदी हुई चीज के दिए जा जा रहे है, उतने पैसे के वो काबिल नही। वो प्रोडक्ट इसलिए नहीं खरीदा जाता, क्योंकि उसमें उतने फीचर्स हैं, बल्कि इसलिए खरीदा जाता है, क्योंकि वो लगज़री है।

ऐसे प्रोडक्ट सिग्नल देता है आपकी सक्सेस की तरफ, आपकी वेल्थ की तरफ, की आप के पास इतना पैसा है। जैसे महंगी कार, रोलेक्स की घड़ियां, iPhone, महंगे पर्स दिखाते है कि सामने वाला सफल और अमीर है। लेकिन, इसमें फंसते वो हैं जिनके पास पैसे नहीं है, वो अमीर तो नहीं है, पर वो इनफियोरिटी कॉम्प्लेक्स के कारण, अमीरी का झूठा नाटक करना चाहते हैं।

ज्यादातर भारत में इस चीज को ले कर ज्यादा बुरे हालात है। इसका सबसे बड़ा सबूत है कि इस वक्त, भारत में 70% iPhone EMI पर हैं। इसके अलावा 28% इंडियन कहते हैं, कि हम लग्जरी गुड्स को सिर्फ इसलिए खरीदते हैं ताकि हम शो ऑफ कर सकें, फिर चाहे वो चीज़ वैल्यू फॉर मनी हो या ना हो। 74% इंडियन कहते हैं कि हमें कोई गिल्ट भी नहीं, कि हमने कोई महंगी चीजें खरीद ली।

यहाँ तक कि 29% इंडियन तो यह कहते हैं, कि हाँ हम मानते हैं कि हम हमने भावुक हो कर या किसी सेलिब्रेशन में, लग्जरी गुड्स खरीदते हैं, फिर चाहे हम उसे अफोर्ड भी ना कर सके। 79% इंडियन तो इतना भी कहते हैं, कि वो ब्रांड के लोगो की रेपुटेशन, जैसे Apple का सिर्फ लोगो देख कर ही हम वो उस चीज खरीद लेते हैं। लग्जरी गुड में हम कितना भी खर्च कर सकते हैं.

और 79% इंडियन यह भी कहते हैं, कि उन्होंने किसी महंगी चीज को खरीदने का फैसला इसीलिए किया, क्योंकि वह प्रॉडक्ट उन्होंने किसी फलाने सिलेब्रिटी के हाथों में देखा था। हद है यार.

हो सकता है आपने भी कोई ना कोई ऐसी ही शॉपिंग की होगी, जो केवल शो–ऑफ के लिए की गई, और उतनी वैल्यू फॉर मनी भी नहीं थी।

इसे ही Veblen Effect कहते है। इस के विक्टिम केवल आप अकेले नहीं हैं, दुनिया भरी पड़ी है, अमेरिका में भी 86 बिलियन डॉलर क्रेडिट कार्ड का डेप्थ, लोगों पर भरा पड़ा है। तो यह एक यूनिवर्सल दिक्कत है, सब जगह ही व्याप्त है।

Veblen Effect

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कैसे फंसते हैं लोग वेब्लेन इफेक्ट में?

1. हाई सोशल स्टेटस

आपके पास यदि लग्जरी आइटम है, Rolex की घड़ी, आईफोन, या महंगी गाड़ियां, तो समाज में आपका स्टेटस हाई माना जाता है, आपको सफल माना जाता है। जो कि एक तरह से देखा जाए तो सही भी है, आपके पास लग्जरी गुड है, यानी आपके पास पैसे हैं, जिस से दूसरो को पता चलता है कि आपका स्टेटस हाई है।

लेकिन असल दिक्कत शुरू होती है, जिनके पास ज्यादा पैसे भी नहीं है, वो भी ऐसे प्रोडक्ट EMI पर ले कर, अपने आप को सफल दिखाने का नाटक करते हैं।

हो सकता है आपको लगता हो की यदि आपके पास iPhone है, तो समाज में आपका स्टेटस हाई है, पर असल में समाज को कोई घंटा फर्क नहीं पड़ता। मान लो आपने किसी को देखा, जिसके पास Rolex की घड़ी है या iPhone 15 Pro Max है, अब क्या उसे देखते ही आपके मन में उसके लिए प्रशंसा जाग जाती है क्या? नहीं ना। बल्कि असलियत में तो आपको खुद के लिए इन्फिरीअर लगना शुरू हो जाता है। तुम्हें खुद के लिए बुरा लगने लगता है, और फिर खुद को गरीब और ज्यादा से ज्यादा नाकामयाब समझने लगते हो।

यह उस व्यक्ति के बारें में है ही नहीं, बल्कि आप उल्टा डिफेंसिव मैकेनिज्म में उसका बुरा कर सकते हो, उस व्यक्ति के बारे में या सोच कर कि, इस के बाप का पैसा होगा, काला पैसा होगा, अब असल में वो कैसे भी आया हो, उससे कोई मतलब नहीं। आप असल में खुद को किसी ना किसी तरह सेटिस्फाई कर रहे हो।

और आपकी सब कॉन्शियस माइंड में एक बात जा चुकी है, कि मुझे भी अमीर होना है, मुझे भी ऐसा ही दिखना है। पर आप असल में अमीर होने के बजाय, आमिर दिखने में कंसंट्रेट करने लगते हो, और जाकर यह एमी पर ऐसी चीज ले आते हो।

इसी तरह आप दूसरों को वह आईफोन दिखा कर शो ऑफ करने लगते हो, जिससे वह सामने वाला व्यक्ति खुद इनफीरियर फुल करने लगता है। और वह भी जाकर ले आता है, EMI पर आईफोन और यह लूप कभी खत्म नहीं होता। इसी तरह यह लग्जरी ट्रैप चलता है ही रहता है और इन कंपनियों की महंगी वस्तुएं जो की वैल्यू फॉर मनी भी नहीं है बिकती रहती है।

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2. Advertisement का रोल

इसमें सबसे बड़ा रोल दूसरा निभाते हैं, ऐडवर्टाइजमेंट। कंपनी लग्जरी गुड्स को केवल लग्जरी गुड्स कह कर बेचती है, ना कि यह कह कर बेचती है, कि हम जितने पैसे ले रहे हैं, उतने की ही हम वैल्यू देंगे।

वो सीधा सीधा कहते हैं, यह लगजरी प्रॉडक्ट है, मतलब अमीरों के लिए है, तुम गरीब नहीं ले सकते। आपने अगर इनकी एडवर्टाइजमेंट देखी है, तो उन प्रोडक्ट्स की प्लेसमेंट ही एडवर्टाइजमेंट में लग्जरी जगह पर की जाती है। मेरे पास मार्शल का एक प्रमोशन आया था, मैंने उनके लिए एक वीडियो बनाई जहाँ पर मैंने उनका प्रोडक्ट छत पर रख दिया था। वीडियो तो उनको अच्छी लगी, पर उन्होंने कहा हमारा प्रॉडक्ट लगजरी है, इसको आप प्रीमियम और अमीर जगह पे रखो। फिर मैंने वो अमीर जगह पे रखा, तब जा कर उन्होंने वो वीडियो बनवाई।

अगर आप iPhone   के ऐड देखो तो उस में सब कुछ आपको अमीर ही अमीर दिखेगा। रिलायंस जियो के फ़ोन की तरह नहीं, कि गांव के किसी बुजुर्ग के हाथ में फ़ोन दे दिया, या टाटा की ऐड की तरह गांव या किसी गरीब के हाथ में दे दिया, नहीं। ऐड में, आईफोन कभी किसी गरीब के हाथ में दिखेगी नहीं, किसी गांव जैसी जगह पर वो ऐड करेंगे ही नहीं।

और यही बात जा कर आपके सबकॉन्शियस माइंड में रजिस्टर हो जाता है, की महंगा आईफोन मतलब अमीरीयत। और आप अमीर ना होते हुए भी इस ट्रैप में फंस जाते हो, और अमीर दिखने के चक्कर में EMI पर iPhone खरीद लेते हो।

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3. महंगी चीज़ का बेहतर क्वॉलिटी से संबंध

लोग समझते हैं कि महंगी चीज यानी बेहतर क्वालिटी, जबकि असल में ऐसा है ही नहीं। जैसे गिब्सन के गिटार की क्वालिटी उतनी अच्छी नहीं है, लेकिन वो फिर भी महंगे बिकते हैं।

1.5 लाख का बैग, कोई बुलेट प्रूफ नहीं होता, वो बस एक साधारण सा बैग होता सिंपल है, लेकिन सिर्फ लग्जरी कह कर बेचा जाता हैं। शाहरुख खान के बेटे की कंपनी है, D’YAVOL X जो 2 लाख की एक जैकेट, 25 हज़ार की टीशर्ट बेचती है। अब ऐसा नहीं है, की उस से गोली आर–पार नहीं होती, वो केवल लग्जरी के नाम पर इस कीमत में बिकती है।

रोलेक्स की घड़ी भी वही समय बताती है जो एक आम घड़ी बताती है, हालांकि रोलेक्स की घड़ी में आपको सफायर के गिलास दे दिया जाता है, जिसमें स्क्रैच नहीं आते, लेकिन स्क्रैच के लिए 2.5 लाख देने का क्या मतलब? तो जरूरी नहीं है कि एक्सपेंसिव प्रोडक्ट वैल्यू फॉर मनी देते हों।

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4. iPhone में बढ़िया फोटो

कुछ लोग यह आर्गुमेंट देते हैं कि भाई iPhone में, फोटो कितनी बढ़िया आती हैं, सस्ते फोन में फोटो बढ़िया नहीं आती। जो को एक तरह से सही है, फोटो बढ़िया जरूर आती है, लेकिन उस से आपकी शक्ल नहीं बदलने वाली।

मान लो, आपने एक बढ़िया फोटो खींच कर इंस्टाग्राम पर डाल दी, और आपके चार दोस्तों ने तारीफें भी कर दी, की सुंदर या स्मार्ट लग रहा है, तो क्या उस से आपकी जिंदगी बदल गई? या उससे कोई ग्रोथ हो गई? या आपकी सैलरी बढ़ गई? कुछ नहीं बढ़ा, ना?

वो चार दोस्त आपकी तारीफें वैसे भी कर देंगे, दो-चार फिल्टर इंस्टाग्राम के वैसे भी लगा लेना। फोटोग्राफर आप हो नही, अगर होते तो आपके पास प्रोफेशनल कैमरा होता। तो फोटो का आर्ग्यूमेंट यहाँ है ही नहीं।

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5. शौक का हवाला

shauk badi cheez hai

सबसे खतरनाक है, की आप खुद को मूर्ख बनाते हो। आपका इंपोस्टर सिंड्रोम ट्रिगर हो चुका है, मतलब कि आप खुद को नीचा समझते हो, अपने आप को नाकामयाब समझते हो.

कई लोगों को तो हिस्टोरिक पर्सनालिटी डिसऑर्डर भी हो गया है, उनको दूसरो से अटेंशन चाहिए. तो ऐसे में वो खुद को, जब वो अमीर नहीं बन पाते, तो अमीर दिखने पर ज्यादा ध्यान देने लगते हैं। जिसके लिए वह, महंगा पर्स, रोलेक्स की घड़ी नहीं मिली तो कॉपी या फिर iPhone खरीदेंगे।

चूंकि आप उसे अफोर्ड नहीं कर सकते, तो आप इतनी महंगी चीज लेने से घबराते हो, और आपको एक प्रकार का वैलिडेशन चाहिए। जिसके लिए आप कही से सुन ने लगते हो एक ही ज़िंदगी है, कल को मर गए तो या शौक बड़ी चीज़ है या शौक की कोई कीमत नहीं होती है। और आप भी खुद को अपने को कन्विंस कर लेते हो की “अरे! सही कह रहे हो”। लेकिन कीमत नहीं होती तो चाइना का वो लड़का आज बेड पर नहीं लेता होता। यह सिर्फ खुद को वैलिडेट करने की बात है।

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कैसे बचाए खुद को?

1. समझे Need और Want में अंतर

difference between need and want

इन बेवकूफ़ी भरे से आप खुद को ही उल्लू बनाते हो, और वेब्लेन इफेक्ट आप अपर नहीं पड़ता बल्कि आप वेब्लेन इफेक्ट पर जा कर पड़ जाते हो।

यदि आप इस वेब्लेन इफेक्ट या लग्जरी ट्रैप से बचना चाहते हो, तो सबसे पहले जरूरत और इच्छा में अंतर समझो।

स्पेशलिस्ट कहते हैं, कि आपको अपनी इनकम का 50% Need यानी जरूरत में खर्च करना चाहिए, 30% आपको Want में इच्छा में खर्च करना चाहिए, और बचे हुए 20% आपको भविष्य में के लिए रखने चाहिए। लेकिन आप 2 लाख का फोन ले लेते हो, और 130% इच्छा पर खर्च डालते हो।

और यदि आपको लगता है कि iPhone आपकी जरूरत है, तो ऐसा बिल्कुल भी नही है। आप का फोन में काम क्या होता है, आप तो छोड़ो 70 से 80% लोग अपने फोन में केवल व्हाट्सएप चलते है, यूट्यूब देखते है, कुछ गेम खेल लेते है या रोजाना के आम काम कर लेते है। यह सारे काम एक 12 से 15 हज़ार वाले फोन में बहुत अच्छे से हो है। कोई ऐसा काम नहीं है, जो केवल iPhone ना होने की वजह से रुक रहा हो।

आपके पास ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसके कारण आपका काम रुक गया है। यदि आपके पास फ़ोन नहीं होगा, तो जरूर परेशानी में आ सकते हो। हो सकता है आपका काम खराब हो जाए, तो ऐसे में फ़ोन जरूरत बन जाता है।

लेकिन आईफ़ोन लेना या महंगी गाड़ी लेना, आपकी इच्छा है, कि मेरे पास यह होना चाहिए, उसमें आमदनी का 30% खर्च करना है, 130% नहीं।

स्पेशलिस्ट तो यह भी कहते हैं, की यदि आपके पास 50 हज़ार की मासिक आय है, तब ही जा कर आपको 15 से 20 हज़ार का फोन खरीदना चाहिए। 2.5 लाख की आय पर, 1.5 लाख का फोन खरीदना चाहिए। लेकिन आप 10 से 20 हज़ार की तनख्वा में, 1.5 लाख का iPhone ले आते हो, और बाद में डिप्रेशन में आ जाते हो। तो अपनी जरूरत और आवश्यकता में अंतर करना सीखिए।

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2. अपने बजट पर रहें अडिग

आप इस पर अडिग रहो, की यदि हमें, 20 हज़ार का फोन लेना है, तो 20 का ही लेना है, 1₹ महंगा नहीं लेंगे, भले ही 1₹ कम ले लेंगे।

और जब आप कोई भी खर्चा करो, तो देखो लॉन्ग टर्म में यह आपके खर्चे बढ़ा रहा है, कि आपके खर्चे घटा रहा है। iPhone लेने के बाद, उसका टेम्पर्ड भी महँगा ही चढ़ेगा, गिर गया तो रेपरिंग भी महँगी होगी, है ना? यह आईफोन 10 दिन बढ़िया लगते है, उसके बाद खुद ही गिल्ट होने लगता है, कि ज्यादा ले लिया।

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3. No-Cost EMI जैसी कोई चीज नहीं

तो भाई जिनके पास पैसे हैं, उनका लेना बनता है, वो ले सकते हैं, और वो ले भी नहीं रहे हैं। लेकिन आप खा म खा दिखावे के चक्कर में EMI पर फोन ले लेते हो।

EMI पर एक फोन आप ले भी लो, तो सैमसंग और iPhone के रेट, 6 महीने बाद 10%-15% तक गिर जाते हैं। 10-10 हज़ार 15-15 हज़ार वो सस्ता हो जाता है. तुम कहते हो नहीं भैया।

और एक टर्म यह इस्तेमाल करते है No Cost EMI, रिजर्व बैंक ने साफ कह दिया है कि नो कॉस्ट EMI, यानी जीरो इंटरेस्ट जैसा कोई प्रोडक्ट मार्केट में नहीं है। इसका साफ साफ मतलब है कि मैन्युफैक्चरर या दुकानदार, किसी ना किसी तरह हमसे वह इंटरेस्ट लेते हैं, जिसका हमें पता भी नहीं चलता।

Money is falling like rain

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       तो जब कोई व्यक्ति अमीर होता है, तो वह ऐसी लग्जरी वस्तुएं खरीद सकता है, और खरीदना है। लेकिन यदि आपके पास कोई लग्जरी वस्तु है, तो उसे आप अमीर नहीं बन जाते।

बल्कि कमाल की बात तो यह है की जो टॉप रिचेस्ट लोग हैं, वो मामुली जिंदगी जीते हैं, उनके पास तो आई फ़ोन तक भी नहीं है। जैसे, हाथवे के सीईओ वॉरेन बफेट, मामुली ज़िंदगी जीते हैं और iPhone इस्तेमाल नहीं करते।

सलमान खान के पास मामुली सी कार है, आइफोन नहीं है। शाहरुख खान नोकिया ल्यूमिया इस्तेमाल किया करते थे। Carlos Slim आईफोन इस्तेमाल नहीं करते और सादा जीवन जीते हैं। इंडियन टाइकून अजीम प्रेमजी, के पास कोई आइफोन नहीं है, नॉर्मल लाइफ जीते हैं। और ऐसे ही बहुत सारे अमीर लोग है, जो आम ज़िंदगी जीते हैं, बिना आईफोन के अमीर है। तो अमीर लोग iPhone खरीद सकते हैं, लेकिन एक आईफोन लेने वाला व्यक्ति अमीर नहीं हो जाता है।


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