Smartphones में Peak Brightness का असल सच

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Smartphones में Peak Brightness का असल सच

मोबाईल फोन कंपनियां अपने फोन बेचने के लिए कुछ भी दावे करने लगती है। कभी 12 जीबी रैम दिखाकर, तो कभी 100MP कैमरा दिखा कर। अब जब कुछ नहीं बचा, तो अब यह नया गिमिक इस्तेमाल करने लगी है, जो है Peak Brightness।

बहुत से स्मार्टफोन आपको 3000, 4000, या बल्कि 4500 nits की peak brightness देने तक के दावा करती है, जिसे सुन लगता है की क्या ही शानदार फोन है। लेकिन असल में peak brightness सच में कुछ काम का भी है या नहीं। तो आज हम यही जानेंगे, की एक बढ़िया स्मार्टफोन डिस्प्ले चुनने के लिए आपको किस चीज की असल में जरूरत है।

using phone in extreme sunlight

Peak brightness क्या है?

Peak brightness का मतलब ऐसे maximum brightness level से है जिसे स्क्रीन के एक छोटे से हिस्से में दिखाया जा सकता है, खासतौर पर HDR विडियो चलाते समय।

HDR का मतलब है, High Dynamic Range। यह वह टेक्नोलोजी है, जो किसी इमेज के कंट्रास्ट और कलर को बढ़ती है, जिस से यह और ज्यादा असली और इमर्सिव लगती हैं। किसी HDR कंटेंट को रोशनी वाली चीजें और अंधेरे वाले सीन दिखाने के लिए peak brightness brightest की जरूरत बेशक होती है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है, की फोन के रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए भी इसकी जरूरत है। आमतौर पर आप नेट चला लेते है, चैट कर लेते है, या ज्यादा से ज्यादा गेम खेल लेते है, जिसके लिए peak brightness का कोई औचित्य ही नही। और ऐसा कोई एंड्रॉयड गेम्स भी नही है, जो HDR को सपोर्ट करता हो, ना ही ज्यादातर एप्स और वेबसाइट HDR के लिए डिज़ाइन की जाती है।

तो, peak brightness को केवल बहुत कम APL (Average Picture Level) पर मापा जाता है, जिसका मतलब है की स्क्रीन का बहुत कम प्रतिशत ही सफेद दिखता है, और बाकी के काले होते हैं। उदाहरण के लिए, स्मार्टफ़ोन बनाने वाले आमतौर पर, 2% APL पर peak brightness निर्धारित करते है, जो की ज्यादातर लोगों के लिए रियलिस्टिक नहीं है।

Peak brightness क्यों ज़रूरी नहीं है?

जिसका मतलब है आप भी ब्राइटनेस को 3000-4000 nits की peak brightness लेवल, अक्सर बहुत से डिवाइड के लिए High Brightness Mode में अव्यावहारिक लगते है। और अगर हो भी जाए, तो उसका पावर कंजप्शन और हिट जेनरेशन ऐसा होने नही देगा। तो बहुत से स्माटफोन ब्रांड, अपनी पिक ब्राइटनेस को केवल कुछ मिनट हो या सेकंड तक लिमिट कर देते हैं, और केवल तभी एक्टिव करते हैं जब एंबिएंट लाइट बहुत हाई हो। जिसका मतलब है आप peak brightness को कभी काम करते मुश्किल से ही देख पाएंगे, जब तक आप HDR वीडियो धूप की रोशनी में न देख रहे हों।

असल में, peak brightness केवल एक अकेला ऐसा फैक्टर नहीं है, जो डिस्प्ले की क्वालिटी और विजिबिलिटी निर्धारित करता हो। और भी कई फैक्टर जैसे कंट्रास्ट रेश्यो, कलर, एक्यूरेसी, व्यूइंग एंगल, रिफ्रेश रेट, और रेजोल्यूशन, भी उतने ही ज़रूरी हैं।

जैसे, एक डिसप्ले में होने को तो ज्यादा peak brightness है, पर contrast ratio कम, तो वह डिसप्ले थकी हुई और बेकार दिखेगी। जबकि कम peak brightness लेकिन ज्यादा contrast ratio वाली डिसप्ले ज्यादा वाइब्रेंट और शार्प लगेगी।

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कितनी brightness levels आपको असल में चाहिए?

बस peak brightness पर ध्यान देने से अच्छा है, आप डिस्प्ले की typical brightness और adaptive brightness पर ध्यान दें। Typical brightness का मतलब पूरी स्क्रीन की ब्राइटनेस से है, जिसे आप स्लाइडर के जरिए खुद से एडजस्ट करते हैं। तो वही Adaptive brightness का मतलब ambient light सेंसर की मदद से, ऑटोमैटिक ब्राइटनेस एडजस्ट करने से है।

यह वो ब्राइटनेस है, जिसे ताल्लुक आपसे पूरे टाइम पड़ेगा, और इसी का असर सीधे आपके आंखों के कंफर्ट और बैटरी के जीवन पर पड़ेगा।

नॉर्मल ब्राइटनेस 400 से 600 nits की सही मानी जाती है, अगर घर के अंदर इस्तेमाल करनी है तो। यह रेंज आपको मामूली लाइटिंग में साफ और वाइब्रेंट डिस्प्ले देती है। और 800 की peak brightness या इस से ज्यादा बाहर सूरज की रोशनी के लिए सही रहती है। लेकिन, यह नंबर पूरी तरह भी ठीक नही है, यह डिस्प्ले की टेक्नोलोजी, कलर मोड, और व्यक्तिगत इच्छा पर भी निर्भर करती है।

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निष्कर्ष

यह मानना बिल्कुल गलत नहीं होगा, की Peak brightness एक पूरी तरह से Marketing gimmick है, जिसका इस्तेमाल यह कंपनियां केवल ग्राहकों को लुभाने के लिए करती है। यह बिलकुल भी डिस्प्ले की क्वालिटी या परफॉर्मेस की गारंटी नहीं लेता। Peak brightness स्क्रीन के बेहद छोटे से हिस्से पर ही अप्लाई होता है, वो भी तब जब HDR कंटेंट चलाया जा रहा हो। यह बिलकुल भी ज्यादातर हालातों में फोन की असल ब्राइटनेस लेवल को नहीं दिखता।

उप्पर से, peak brightness के कई नुकसान भी है, जैसे की यह बैटरी ज्यादा खाता है, फोन को और गरम कार्य है, और स्क्रीन की क्वालिटी को भी घटाता है।

इसलिए, आपको अपने स्मार्टफोन खरीदने का फैसला बिलकुल भी सिर्फ peak brightness के आधार पर नहीं लेना चाहिए। इस से अच्छा आपको दूसरे फैक्टर जैसे, typical brightness, adaptive brightness, contrast ratio, color accuracy, viewing angles, refresh rate, और resolution भी देखना चाहिए। इन सब का प्रभाव आपके स्मार्टफ़ोन एक्सपीरिएंस पर हमेशा पड़ेगा। याद रखे, ज्यादा नंबर का मतलब हमेशा बेहतर नहीं होता।


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