Nomophobia का बढ़ता हुआ खौफ: कैसे फ़ोन हमें गुलाम बना रहे है

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Nomophobia का बढ़ता हुआ खौफ: कैसे फ़ोन हमें गुलाम बना रहे है

इसमें शायद किसी को हैरानी नहीं होगी कि स्मार्टफोन के लिए हमारा लगाव एक बहुत ऊंचे स्तर तक पहुंच गया है। और इसी के साथ लोगों में तेजी से बढ़ती हुई बीमारी है: Nomophobia। यानि “नो मोबाइल फोन फोबिया”, सीधे शब्दों में एक ऐसा डर जो फोन के आसपास न होने से लोगों में आने लगता है। यह बस एक यू ही समय के साथ गुजरने और खत्म होने वाली बीमारी नहीं है, बल्कि यह समय के साथ और ज्यादा विकराल रूप लेने वाली बीमारी है, जो की एक ग्लोबल परेशानी बन चुकी है।

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स्क्रीन के नीचे छिपे खतरे:

1. मानसिक स्वास्थ्य: Nomophobia एंजायटी, डिप्रेशन और अकेलेपन से जुड़ा है। फियर ऑफ़ मिसिंग आउट (FOMO) और ऑनलाइन प्रेजेंस को बनाए रखने का दबाव, सेल्फ-एस्टीम और सोशल इंटरेक्शन पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।

2. रिश्ते: लगातार फोन चेक करने से रिश्तों में दूरी और अलगाव पैदा हो सकता है। ध्यान वास्तविक समय की बातचीत से हटकर वर्चुअल स्थानों की ओर चला जाता है, जिससे कम्युनिकेशन टूट जाता है और नेगलेक्ट की भावना पैदा होती है।

3. शारीरिक स्वास्थ्य: अत्यधिक फोन के उपयोग से गर्दन, हाथ और आंखों पर दबाव पड़ता है, जिससे मस्कुलोस्केलेटल समस्याएं और दृष्टि संबंधी समस्याएं होती हैं। नींद में खलल भी आम बात है, जो पूरे स्वास्थ्य पर और ज्यादा प्रभाव डालती है।

4. प्रोडक्टिविटी: नोमोफोबिया फोकस और एकाग्रता में बाधा डालता है, काम और एकेडमिक परफॉर्मेंस को प्रभावित करता है। नोटिफिकेशन चेक करने की निरंतर इच्छा कार्यों को बाधित करती है और एफिशिएंसी को कम करती है।

 

यूथ: सबसे ज्यादा खतरे में

युवा, एडल्ट्स और टीनेजर्स विशेष रूप से नोमोफोबिया के प्रति संवेदनशील होते हैं। स्टडीज से पता चलता है कि इन आयु समूहों में 70% तक लोग इस एंजाइटी का अनुभव करते हैं। उनका जीवन स्क्रीन, सोशल मीडिया और इंस्टेंट कम्युनिकेशन के इर्द-गिर्द घूमता है। अपने फोन से अलग होने के विचार मात्र से ही पैनिक होने लगते है।

लेकिन यह मत समझिए कि पुरानी पीढ़ियाँ इस से इम्यून हैं। यहां तक कि वे खुद को हर समय अपने फोन को सबकॉन्शियसली ढूंढने लगते है, यहां तक कि अपने सपनों में भी वो खुद को फोन के साथ ही पाते हैं। अपनी डिजिटल लाइफलाइन खोने का डर असली पैनिक अटैक्स को ट्रिगर कर सकता है।

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वैश्विक महामारी

नोमोफोबिया विशिष्ट जगहों या कल्चर तक ही सीमित नहीं है। चौंका देने वाली बात है की, ग्लोबल पॉपुलेशन का 66% कुछ हद तक इस डर का अनुभव करता है। फिर चाहे आप हलचल भरे टोक्यो में हों या स्विट्जरलैंड की शांत वादियों में, हमारे डिवाइस के प्रति लगाव किसी भी देश की सीमाओं से परे है।

अमेरिका में, आँकड़े आँखें खोलने वाले हैं। 73% स्मार्टफोन मालिक स्वीकार करते हैं कि जब वे अपना फोन खो देते हैं तो उन्हें घबराहट महसूस होती है। यह सिर्फ एक गैजेट खोने के बारे में नहीं है; यह हमारे संपूर्ण डिजिटल अस्तित्व तक पहुंच खोने के बारे में है। हमारे कॉन्टैक्ट्स, संपर्क, यादें, काम के ईमेल और बिल्ली के वीडियो – सब कुछ हमारी उंगलियों पर है।

 

पुरुषों में है ज्यादा

दिलचस्प बात यह है कि पुरुषों में महिलाओं की तुलना में नोमोफोबिया का खतरा थोड़ा अधिक होता है। वह ज्यादा फोन के प्रति सेंसिटिव होते है।

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कैसे बचे इस बीमारी से?

1. सीमाएँ निर्धारित करें: अपने घर में ऐसे एरिया निर्धारित करें, जैसे बेडरूम या डिनर टेबल, जहाँ फ़ोन की अनुमति नहीं है। एक निर्धारित पीरियड बनाए, जैसे शाम या वीकेंड्स पर, जब अपने फोन से पूरी तरह डिस्कनेक्ट रह सकें। डिस्ट्रेक्शंस को कम करने के लिए, काम, पढ़ाई या छुट्टियों के दौरान नोटिफिकेशन को साइलेंट रखें।

2. रियल-लाइफ बातचीत को प्राथमिकता दें: दूसरों के साथ पूरी तरह मौजूद रहने के लिए खाने के समय, गैदरिंग या डेट के दौरान अपना फोन दूर रखें। ऐसी गतिविधियाँ करें जो व्यक्तिगत बातचीत को प्रोत्साहित करें, जैसे हाइकिंग, बोर्ड गेम नाइट्स, या वोलंटियरिंग। दोस्तों और परिवार के साथ क्वॉलिटी टाइम निर्धारित करें, जहां सारा फोकस एक्सपीरिएंस शेयर करने और डीप बातचीत पर केंद्रित हो।

3. वैकल्पिक गतिविधियाँ ढूंढे: उन इंटरेस्ट को एक्सप्लोर करें जिनमें स्क्रीन शामिल नहीं है, जैसे संगीत, पेंटिंग, या कोई नई भाषा सीखना। तनाव दूर करने और प्राकृतिक दुनिया से दोबारा जुड़ने के लिए वाक्स, हाइक्स या पिकनिक पर जाएँ। प्रेजेंट-मूमेंट अवेयरनेस पैदा करने और टेक्नोलोजी पर निर्भरता कम करने के लिए ध्यान, योग या डीप ब्रिथिंग करें।

4. प्रोफेशनल मदद लें: एक थेरेपिस्ट एंजाइटी को दूर करने और नोमोफोबिया से बचने के लिए कॉग्निटिव-बिहेवियरल थेरेपी दे सकता है। आपके स्ट्रगल को समझने वाले दूसरे लोगों के साथ जुड़ने से समर्थन और प्रोत्साहन मिल सकता है।

       आख़िर में, जागरूकता पहला कदम है। पहचानें कि कब आपकी फ़ोन निर्भरता गलत दिशा में पहुंच चुकी है। “फ़ोन फ़ास्टिंग” का प्रयास करें – जब डेडीकेटेड घंटों के लिए फोन से डिस्कनेक्ट रहे। आमने-सामने की बातचीत, सनसेट और पत्तियों की सरसराहट की खुशी को फिर से खोजें वो भी हाथ में स्क्रीन के बिना।

नोमोफोबिया जल्द ही दूर नहीं होने वाला है, लेकिन हम अपने डिवाइसेज को अपने जीवन पर हावी हुए बिना उनके साथ रहना सीख सकते हैं। आख़िरकार, जीवन केवल नोटिफिकेशन और इंस्टाग्राम लाइक्स की एक सिरीज़ से कहीं ज्यादा है। 📱🌿


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