मोमेंट्स को कैद करने का मनोविज्ञान: हम आखिर क्यों लेते है हर चीज़ का फोटो?

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मोमेंट्स को कैद करने का मनोविज्ञान: हम आखिर क्यों लेते है हर चीज़ का फोटो?

आज की दुनिया में जहां सब कुछ डिजिटल है, हमारा कैमरा हमारे ही एक हिस्से की तरह बन चुका है। यह एक जादू की छड़ी की तरह है जो हमें तस्वीरें लेने, समय रोकने और यादें हमेशा के लिए सहेजने देती है। लेकिन जब हम फ़िल्टर और पिक्सेल में बिज़ी हैं, तो क्या हम कुछ बहुत जरूरी चीज भूल गए हैं?

हैरानी को बात है: हर सेकंड, दुनिया भर में लगभग 3.8 ट्रिलियन फोटोज़ ली जाती हैं! यह हमारे पूरे जीवन में ली गई धड़कनों की गिनती से भी कही ज्यादा है। लेकिन हम अपने खाने, डूबता सूरज, या यहाँ तक कि बस एक छोटी सी स्माइल जैसी हर छोटी चीज़ को कैप्चर करने के लिए पागल रहते हैं।

एक औसत व्यक्ति अपने जिंदगी में 25,000 से ज्यादा सेल्फी लेता है। जो की एक पूरी गैलरी भरने के लिए काफी है! लेकिन हम आखिर अपनी इतनी सारी फोटोज़ क्यों लेते हैं? इन सभी सेल्फी के पीछे क्या मतलब है?

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यादों का विज्ञान

आपका ब्रेन एक बड़ी जटिल मैमोरी मशीन के रूप में काम करती है। जो असल में उन चीज़ों को याद रखने में अच्छी है जो हमारे साथ होती हैं, जैसे मज़ेदार छुट्टियाँ या दोस्तों के साथ बिताए स्पेशल मोमेंट्स।

लेकिन जब हम पिक्चर्स लेते हैं, तो हमें लगता है कि हम हर चीज़ को वैसे ही कैप्चर कर रहे हैं जैसी वह है, लेकिन असल में हमारा दिमाग पिक्चर्स की तुलना में चीज़ों को कहीं बेहतर तरीके से याद रखता है। जब हम कोई पिक्चर खींचते हैं, तो जो कुछ चल रहा है उसका केवल एक छोटा सा हिस्सा ही हम फ्रीज़ कर पाते हैं। लेकिन, हमारा दिमाग इस मोममेंट में बाकी डिटेल भरता है, जिससे एक पूरी पिक्चर बनती है, जो फ़ोटो में मौजूद चीज़ों से कहीं ज्यादा असली होती है।

इसके लिए एक टर्म का इस्तेमाल किया जाता है: प्रॉस्पेक्टिव मेमोरी (Prospective Memory)। यह आपके ब्रेन की भविष्य के लिए टू-डू लिस्ट की तरह है। जब हम फोटोज़ लेते हैं, तो असल में हम अपने दिमाग से कह रहे होते हैं, “अरे, इस चीज़ को याद रखने की कोई जरूरत नहीं है, कैमरे ने इसे कवर कर तो लिया है।” इसलिए, हम चीजों को याद रखने के लिए अपनी कमाल की मेमोरी पावर का इस्तेमाल करने के बजाय पिक्चरर्स पर भरोसा करने लगते हैं।

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परफेक्शन की कीमत

वह जगह जहां हर कोई परफेक्ट दिखने की कोशिश करता है, इंस्टाग्राम के 1 बिलियन से ज्यादा यूजर हैं। हम अच्छे से तैयार की गई इन फ़ीड्स को स्क्रॉल करते हुए घंटों बिताते हैं, अपने जीवन की तुलना दूसरों की पॉलिश की गई फोटो से करते हैं। लेकिन लगातार इस कंपैरिजन से सच में हमें क्या नुकसान होता है?

रिसर्च से पता चलता है, कि सोशल मीडिया पर बहुत ज्यादा समय बिताना हमें बेचैन, उदास और असुरक्षित बना सकता है। सही फ़ोटो लेने की कोशिश करने से हमें ऐसा महसूस होता है, कि हम उतने अच्छे नहीं हैं।

क्या आपने कभी किसी को इंस्टाग्राम पर परफेक्ट पिक्चर पाने के लिए अपने खाने को अच्छे से अरेंज करते देखा है? हम सबने यह किया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपके खाने की फोटो लेने से असल में आपका एंजॉयमेंट कम हो सकता है?

रिसर्चर्स से पता चला है कि जो लोग खाने से पहले अपने खाने की फोटो लेते हैं, वे उन लोगों की तुलना में कम संतुष्ट महसूस करते हैं और कम आनंद लेते हैं जो फोटोज़ नहीं खींचते हैं। यह ऐसा है जैसे कैमरा हमारी अन्दर की खुशी का कुछ हिस्सा चुरा लेता है।

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सारांश: पिक्सेल से परे

अब इस से पहले कि आप वह फोटो लें, एक पल के लिए सोचें, क्या आप सच में उस पल का महसूस कर रहे हैं या बस उसकी कुछ ही समय रखी जाने वाली पिक्चर को कैप्चर करने की कोशिश कर रहे हैं? जिंदगी केवल फोटो लेने के बारे में नहीं है; यह हर अनुभूति, भावना और कनेक्शन को महसूस करने के बारे में है।

अपने कैमरे नीचे रखकर, अपनी आँखें बंद करके, और असल में इस धरती में होने का आनंद लेने की कोशिश करें। क्योंकि, आख़िरकार, सबसे कीमती यादें वे हैं जिन्हें हम गहराई से महसूस करते हैं, न कि केवल वे जिन्हें हम एक फ्रेम में रखते हैं।


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